सारी दुनिया से जुड़ जाओ
जब भी तुम इंटरनेट चलाओकोई भी जानकारी गूगल करलो
मेरे ज़रिये ब्रह्माण्ड टहल लो
अमेज़न प्राइम पर मूवी देखो
ओ एल एक्स पर कुछ भी बेचो
पेप्परफ्राई पर फर्नीचर लो
मेक माय ट्रिप पर हवाई टिकट लो
इन सब से अगर तुम थक जाओ
तो मेरे ज़रिये ज्ञान जुटाओ
सब प्रश्नों के उत्तर दे दूँ
तुमको और भी बेहतर कर दूँ
पर एक बात का रखना ख़याल
सही दिशा में हो इस्तमाल
न हो कोई साइबर अपराध मगर
वरना जेल का तय होगा सफर
– अनुष्का सूरी
इंटरनेट की कठपुतलियाँ
अजब है इसका खुमार
चढ़ता है जैसे बुखार
सारे भरम तोड़ देता वो
उम्मीद से ज्यादा देता जो
जिस दिन से इंटरनेट की लत लग गई ब
स डेटा पर डेटा भारवाते जब फोन से जी भर जाता
तब लैपटॉप ले आते
मम्मी पापा जब सो जाते तब
छुप कर नेट चालाते है
इसने हटा दी घड़ियाँ
इसने बन्द की खतों कि दुनिया
छुट गई वो पुरानी दुनिया
छुट गए वो मेल मिलाप
कुछ नहीं बस आज रह गया इंटरनेट का प्यार
आज रह गए हम बनकर
इंटरनेट की कठपुतलियाँ||
- रितु सिंह
भगवान राम के अयोध्या आगमन पर चुनिंदा चौपाइयां
जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं॥
एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई॥
भावार्थ:- जो जैसे हैं (जहाँ जिस दशा में हैं) वे वैसे ही (वहीं से उसी दशा में) उठ दौड़ते हैं। (देर हो जाने के डर से) बालकों और बूढ़ों को कोई साथ नहीं लाते। एक-दूसरे से पूछते हैं - भाई! तुमने दयालु रघुनाथ को देखा है?
अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी॥
बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा॥
भावार्थ:- प्रभु को आते जानकर अवधपुरी संपूर्ण शोभाओं की खान हो गई। तीनों प्रकार की सुंदर वायु बहने लगी। सरयू अति निर्मल जलवाली हो गईं (अर्थात सरयू का जल अत्यंत निर्मल हो गया)।
दो० - हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत।
चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत॥
भावार्थ:- गुरु वशिष्ठ, कुटुंबी, छोटे भाई शत्रुघ्न तथा ब्राह्मणों के समूह के साथ हर्षित होकर भरत अत्यंत प्रेमपूर्ण मन से कृपाधाम राम के सामने अर्थात उनकी अगवानी के लिए चले॥
बहुतक चढ़ीं अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान।
देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान॥
भावार्थ:- बहुत-सी स्त्रियाँ अटारियों पर चढ़ीं आकाश में विमान देख रही हैं और उसे देखकर हर्षित होकर मीठे स्वर से सुंदर मंगल गीत गा रही हैं॥राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान।
बढ़्यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान॥
भावार्थ:- रघुनाथ पूर्णिमा के चंद्रमा हैं तथा अवधपुर समुद्र है, जो उस पूर्णचंद्र को देखकर हर्षित हो रहा है और शोर करता हुआ बढ़ रहा है (इधर-उधर दौड़ती हुई) स्त्रियाँ उसकी तरंगों के समान लगती हैं॥जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती॥
रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता॥
भावार्थ:- जिनके विरह में आप दिन-रात सोच करते (घुलते) रहते हैं और जिनके गुणसमूहों की पंक्तियों को आप निरंतर रटते रहते हैं, वे ही रघुकुल के तिलक, सज्जनों को सुख देनेवाले और देवताओं तथा मुनियों के रक्षक राम सकुशल आ गए।रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥
सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा॥
भावार्थ:- शत्रु को रण में जीतकर सीता और लक्ष्मण सहित प्रभु आ रहे हैं; देवता उनका सुंदर यश गा रहे हैं। ये वचन सुनते ही भरत सारे दुःख भूल गए। जैसे प्यासा आदमी अमृत पाकर प्यास के दुःख को भूल जाए।हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए॥
पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई॥
भावार्थ:- इधर भरत भी हर्षित होकर अयोध्यापुरी में आए और उन्होंने गुरु को सब समाचार सुनाया। फिर राजमहल में खबर जनाई कि रघुनाथ कुशलपूर्वक नगर को आ रहे हैं।सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाईं॥
समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए॥
भावार्थ:- खबर सुनते ही सब माताएँ उठ दौड़ीं। भरत ने प्रभु की कुशल कहकर सबको समझाया। नगर निवासियों ने यह समाचार पाया, तो स्त्री-पुरुष सभी हर्षित होकर दौड़े।दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला॥
भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधुरगामिनी॥
भावार्थ:- (राम के स्वागत के लिए) दही, दूब, गोरोचन, फल, फूल और मंगल के मूल नवीन तुलसीदल आदि वस्तुएँ सोने की थालों में भर-भरकर हथिनी की-सी चालवाली सौभाग्यवती स्त्रियाँ (उन्हें लेकर) गाती हुई चलीं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें